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Karnataka 1st PUC Hindi Textbook Answers Sahitya Vaibhav Chapter 12 तुलसीदास के दोहे

तुलसीदास के दोहे Questions and Answers, Notes, Summary

I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिएः

प्रश्न 1.
तुलसीदास किस पर विश्वास करते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास भगवान राम (रघुनाथ) पर विश्वास करते हैं।

प्रश्न 2.
तुलसीदास किसको आराध्य देव मानते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास श्रीराम जी को आराध्य देव मानते हैं।

प्रश्न 3.
संत का स्वभाव कैसा होता है?
उत्तर:
संत का स्वभाव आम के पेड़ की तरह होता है।

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प्रश्न 4.
तुलसीदास काया और मन की उपमा किससे देते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास काया को खेत और मन को किसान की उपमा देते हैं।

प्रश्न 5.
मधुर वचन से क्या मिटता है?
उत्तर:
मधुर वचन से अभिमान मिट जाता है।

प्रश्न 6.
पंडित और मूर्ख एक समान कब लगते हैं?
उत्तर:
काम, क्रोध, मद और लोभ को मन में धारण करने पर पंडित और मूर्ख एक समान लगते हैं।

प्रश्न 7.
तुलसीदास कहाँ जाने के लिए मना करते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास कहते हैं कि जहाँ आदर और स्नेह नहीं मिलता हो वहाँ नहीं जाना चाहिए।

प्रश्न 8.
बिना तेज के पुरुष की अवस्था कैसी होती है?
उत्तर:
बिना तेज के पुरुष की अवस्था अवज्ञा अथवा आग के बुझने पर राख की तरह उपेक्षित होती है।

अतिरिक्त प्रश्नः

प्रश्न 9.
तुलसीदास के अनुसार जग से लोग किस संख्या की तरह नाता रखना चाहिए?
उत्तर:
तुलसीदास के अनुसार जग से लोग छत्तीस की तरह नाता रखना चाहिए।

प्रश्न 10.
सुअंब तरू दूसरों के हित के लिए क्या देता है?
उत्तर:
सुअंब तरू दूसरों के हित के लिए फल देता है।

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प्रश्न 11.
तुलसीदास के अनुसार कौन से दो बीज हैं?
उत्तर:
तुलसीदास के अनुसार पाप और पुण्य दो बीज हैं।

प्रश्न 12.
दूध के उफान को किससे मिटाया जाता है?
उत्तर:
दूध के उफान को शीतल जल से मिटाया जाता है।

प्रश्न 13.
इस संसार में किस प्रकार के लोग हैं?
उत्तर:
इस संसार में भाँति-भाँति के लोग हैं।

प्रश्न 14.
तुलसीदास किसका त्याग न करने के लिए कहते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास अपने कुल की रीति त्याग न करने के लिए कहते हैं।

प्रश्न 15.
ब्याह और प्रीति किसके साथ करनी चाहिए?
उत्तर:
ब्याह और प्रीति उसी से करनी चाहिए जो लायक हो।

प्रश्न 16.
किसकी अवज्ञा अवश्य होती है?
उत्तर:
बिना तेज के पुरुष की अवज्ञा अवश्य होती है।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिएः

प्रश्न 1.
तुलसीदास की रामभक्ति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे तो केवल मेरे इष्ट राम पर भरोसा है, उसी की आशा, उसी का बल है; जैसे स्वाति नक्षत्र में बारिश के पानी की पहली बूंद के लिए चातक पक्षी तरसता रहता है। अर्थात् मेरे राम यदि स्वाति-सलिल हैं, तो मैं चातक हूँ।

प्रश्न 2.
तुलसीदास के अनुसार संत के स्वभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तुलसीदास जी के अनुसार संत का स्वभाव फलदार आम के वृक्ष की तरह होना चाहिए। आम का वृक्ष दूसरों की भलाई के लिए ही फलता और फूलता है। मनुष्य आम को पाने के लिए पेड़ को पत्थर मारता है, बदले में पेड़ मनुष्य को फल (आम) देता है। उसी प्रकार संतो को चाहिए कि वे लोक निंदा कि परवाह न कर समाज को सुधारने के कार्य में लगे रहें।

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प्रश्न 3.
तुलसीदास ने मधुर वचन के महत्व का कैसे वर्णन किया है?
उत्तर:
मधुर वचन के बारे में तुलसीदास जी कहते हैं कि मीठा बोलने से हमारे मन में रहनेवाला अहंकार मिट जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे कि उफनते हुए दूध पर थोड़ा-सा ही शीतल (ठंडा) जल छिड़कने से उफनता हुआ दूध नीचे बैठ जाता है।

प्रश्न 4.
तुलसीदास के अनुसार मनुष्य के जीवन में संतोष-धन का क्या महत्व हैं?
उत्तर:
दुनिया में कई प्रकार के धन हैं। जैसे – गोधन, गजधन, वाजिधन और रतनधन आदि। इन सबके रहते हुए भी अथवा इनको प्राप्त करने पर भी मनुष्य को संतुष्टि नहीं होती। तुलसीदास जी कहते हैं कि जब सन्तोष रूपी धन हमें मिल जाता है, तो ये सभी प्रकार के धन धूल के समान हो जाते हैं। अर्थात् ‘सन्तोष’ ही सबसे बड़ा धन है।

प्रश्न 5.
तुलसीदास कुल रीति के पालन करने के सम्बन्ध में क्या कहते हैं?
उत्तर:
तुलसीदास जी कहते हैं कि हमें अपने कुल के रीति-रिवाज अथवा कुल की परंपरा का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। जो लायक हो उसी से ब्याह कीजिए, जो लायक हो उसी से बैर कीजिए और जो लायक हो, उसी से प्रीति या प्रेम कीजिए।

अतिरिक्त प्रश्नः

प्रश्न 6.
तुलसीदास ने छत्तीस अंक को लेकर अपना कौन सा मत प्रकट किया है?
उत्तर:
तुलसीदास जी कहते हैं कि मनुष्य को इस संसार अर्थात् सांसारिक मोह माया से 36 का रिश्ता रखना चाहिए। जिस प्रकार छत्तीस में 3 और 6 के अंक एक दूसरे के विपरीत होते हैं उसी तरह हमें भी सांसारिकता चीजों के विपरीत रहना चाहिए।

प्रश्न 7.
“जैसा कर्म वैसा फल” इस बात को तुलसीदास ने कैसे स्पष्ट किया है?
उत्तर:
तुलसी ‘जैसा कर्म वैसा फल’ को एक दृष्टांत के माध्यम से समझाते हुए कहते हैं- हमारा शरीर एक खेत है और मन किसान है तथा पाप व पुण्य दोनों बीज हैं। इस प्रकार खेत में जिस प्रकार का बीज बोकर खेती होती है, वैसी ही फसल भी प्राप्त होती है। अर्थात् जीवन में जैसा काम करेंगे हमें फल भी उसके अनुरूप मिलेगा।

प्रश्न 8.
तुलसीदास ने पंडित और मूर्ख की अलग पहचान कैसे बताई है?
उत्तर:
तुलसी कहते हैं कि जब तक मनुष्य काम (वासना), क्रोध, मद, लोभ से ग्रसित रहता है तब तक वह विद्वान होकर भी मूर्ख के समान है। इसलिए मनुष्य को काम, क्रोध, मद तथा लोभ का शीघ्र ही त्याग कर देना चाहिए।

प्रश्न 9.
तुलसीदास ने स्वाभिमान की रक्षा और स्नेह स्वागत के बारे में क्या कहा है?
उत्तर:
तुलसीदास कहते हैं कि तेजहीन मनुष्य का इस संसार में सदैव ही अपमान होता है। अतः हर एक मनुष्य को अपना तेज अर्थात स्वाभिमान को बचाएं रखना चाहिए। तेजवान व्यक्ति का कोई भी अपमान नहीं कर सकता।

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प्रश्न 10.
तुलसीदास ने बुझी हुई आग का उदाहरण देकर क्या समझाया है?
उत्तर:
तुलसी बुझी हुई आग का उदाहरण देकर कहते हैं कि आग के बुझ जाने पर, राख को न केवल छूना आसान हो जाता है, बल्कि उसे लोग कुचल भी देते हैं। उसी तरह तेजहीन मनुष्य को भी लोग अपमानित करते हैं। उसे कुचल देते हैं।

III. ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:

प्रश्न 1.
तुलसी संत सुअंब तरु, फूलि फलहिं पर-हेत।
इतते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत॥
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुलसीदास के दोहे’ नामक संग्रह से लिया गया है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं।
संदर्भ : यहाँ तुलसीदास संत लोगों की विशेषता पर प्रकाश डाल रहे हैं।
स्पष्टीकरण : तुलसीदास कहते हैं कि संत पुरुष उस आम के पेड़ की तरह होते हैं जो हमेशा दूसरों को मीठे फल देता रहता है। बदले में वह कुछ भी नहीं लेता। वह तो दूसरों का उपकार करने के लिए ही फलता-फूलता है। लोग धरती से पत्थर भी फेंकते हैं तो भी वह उन्हें फल ही देता है। संत पुरुष भी ठीक वैसे ही होते है। उनका कितना भी अपमान किया जाए, वे विनम्रता नहीं त्यागते हैं। क्रोध नहीं करते हैं। उनके जीवन का उद्देश्य दूसरों का हित करना ही होता है। एक जगह तुलसी यह भी कहते हैं कि ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ अर्थात् दूसरों की भलाई से बड़ा और कोई धर्म नहीं हो सकता। संत पुरुषों के लिए परहित ही धर्म होता है।
विशेष : अवधी भाषा का प्रयोग। लोक-कल्याण की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।

प्रश्न 2.
तुलसी काया खेत है, मनसा भयौ किसान।
पाप पुण्य दोउ बीज हैं, बुवै सौ लुनै निदान॥
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुलसीदास के दोहे’ नामक संग्रह से लिया गया है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं।
संदर्भ : यहाँ तुलसीदास जी कहते हैं कि हम जैसे कर्म करते हैं, हमें वैसा ही फल मिलता है, इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए।
स्पष्टीकरण : कवि कहते हैं कि हमारा शरीर खेत है और हमारा मन किसान है। पाप और पुण्य ये दो प्रकार के बीज हैं। अब हम इनमें से जो बीज बोएँगे, हमें वैसा ही फल मिलेगा।
अतः अच्छा या बुरा फल पाना हमारे ही हाथ में है।

प्रश्न 3.
तुलसी एहि संसार में, भाँति भाँति के लोग।
सब सो हिल मिल बोलिए, नदी नाव संयोग।।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुलसीदास के दोहे’ नामक संग्रह से लिया गया है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं।
संदर्भ : तुलसीदास कहते हैं कि इस जगत में भिन्न भिन्न विचारों के लोग रहते हैं। हमें उनसे मेल मिलाप के साथ रहना चाहिए।
स्पष्टीकरण : तुलसीदास कहते हैं कि इस संसार में भिन्न-भिन्न विचारों को, धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। हमें सबके साथ सहिष्णुता के साथ रहना चाहिए। हमें उनके विचारों, मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए। सबसे प्रेमपूर्वक बोलना चाहिए। भिन्न विचारों के साथ समन्वय जरूरी होता है।
विशेष : अवधी भाषा और ब्रज भाषा का प्रयोग। भिन्न विचारों के बीच समन्वय पर जोर दिया गया है।

प्रश्न 4.
काम, क्रोध, मद, लोभकी, जौ लौं मन में खान।
तौं लौ पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान।।
उत्तर:
प्रसंग : प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुलसीदास के दोहे’ नामक संग्रह से लिया गया है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं।
संदर्भ : तुलसीदास जी कहते है कि व्यक्ति चाहें जितना बड़ा विद्वान क्यों न हो, जब तक उसके पास अहंकार और लोभ जैसे संस्कार उसमें विद्यमान रहते हैं तब तक वह मूर्ख के समान ही होता है।
स्पष्टीकरण : तुलसीदास कहतें हैं- जब तक हमारे मनरूपी खजाने में काम-क्रोधा आदी अरिषड्वर्ग स्थिर रहते हैं तब तक मूर्ख और पंड़ित एक समान होते हैं। एक साधारण मनुष्य जो उपरोक्त मनोविकारों से बचकर रहता है, वही महान होता है। नहीं तो बड़ा पंडित भी मूर्ख बन जाता है।

तुलसीदास के दोहे कवि परिचयः

महाकवि तुलसीदासजी का जन्म सन् 1532 में हुआ था। आप रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार माने जाते हैं। आपके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। आपके गुरु बाबा नरहरिदास थे। आपके आराध्य देव श्री रामचन्द्र थे और लोकमंगल भावना आपके काव्य का सिद्धांत रहा। आपने अन्यान्य काव्यशैलियों का प्रयोग करते हुए कई रचनाएँ हिन्दी साहित्य जगत को समर्पित की। आपकी मृत्यु सन् 1623 में हुई। ‘रामचरित मानस’, ‘विनय पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘जानकी मंगल’ और ‘दोहावली’ आपकी सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ मानी जाती है। आपका अवधी और ब्रजभाषा पर समान अधिकार था।
प्रस्तुत दोहों में रामभक्ति, नीति, सदाचार, विनय, दान एवं जीवन के समस्त पक्षों पर प्रकाश डाला गया हैं।

दोहे का भावार्थः

1) एक भरोसो, एक बल, एक आस, विश्वास।
स्वाति-सलिल रघुनाथ-जस, चातक तुलसीदास ॥१॥

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तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे अपने इष्ट श्रीराम पर पूरा भरोसा है। एक ही बल, एक ही आशा और एक उन्हीं पर अटूट विश्वास है; ठीक वैसे ही जैसे कि भगवान श्री रघुनाथजी यदि स्वाति नक्षत्र का जल है, तो तुलसीदास चातक पक्षी की तरह है।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 1

The poet, Tulasidasji, says that he has complete faith in his beloved Lord Rama. He has only one source of strength, only one desire, and only one unbreakable faith in his master Lord Rama. He says that if Lord Rama is akin to rain (of the swati nakshatra), then he is like a ‘chatak’ bird (a kind of cuckoo which is supposed to drink only drops of rain).

शब्दार्थ :

  • भरोसो – भरोसा
  • स्वाति-सलिल – स्वाति वर्षा का जल;
  • जस – कीर्ति;
  • चातक – चातक पक्षी।

2) जग ते रह छत्तीस है, राम चरन छ: तीन।
तुलसी देखु विचार हिय, है यह मतौ प्रबीन ॥२॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि मनुष्य को इस संसार से अर्थात् सांसारिक प्रपंच से छत्तीस (३६) जैसा सम्बन्ध रखना चाहिए और परमात्मा के साथ तिरसठ (६३) का सम्बन्ध रखना चाहिए। इसका अभिप्राय यह है कि संसार में रहते हुए भी मनुष्य को संसार के प्रति उदासीनता दिखानी चाहिए और परमात्मा के प्रति हमेशा प्रेम प्रकट करना चाहिए।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 2

Tulasidasji says that man must have a relationship of ’36’ with the world, i.e. with the worldly universe. With the almighty, however, man must establish a relationship of ’63’. What this means is that, although living in a materialistic world like ours, one must show indifference towards the world and towards worldly pleasures. Towards the almighty, however, one must always show love.

शब्दार्थ :

  • छत्तीस – 36;
  • छः तीन – 63;
  • हिय – हृदय;
  • मतौ – अभिप्राय, राय;
  • प्रबीन – प्रवीण, दक्ष।

3) तुलसी संत सुअंब तरु, फूलि फलहिं पर-हेत।
इतते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत ॥३॥

तुलसीदास जी कह रहे हैं कि संत पुरुष उस आम के वृक्ष की भाँति होते हैं। जो आम का वृक्ष दूसरों का उपकार करने के लिए ही फलता-फूलता है। लोग धरती से उसकी ओर पत्थर फेंकते हैं, तो वह आम का फल उन्हें प्रदान करता है। उसी प्रकार संतों का चाहे जितना ही अपमान क्यों न किया जाय, पर वे हम लोगों का उपकार ही करते हैं।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 3

Tulasidasji says that saints and godly men are like a mango tree. They are like the mango tree which flowers and bears fruits only for the sake of others. From the ground, when people throw stones at the mango tree, the tree showers them with fruit. Similarly, no matter how much a saint or godly man is insulted on this earth, he will always bless and wish well for the person who insults.

शब्दार्थ :

  • सुअंब तरु – फल से भरा हुआ आम का वृक्ष;
  • पर-हेत – दूसरों के हित के लिए;
  • इतते – जितने;
  • हनत – मारने से;
  • उतते – उतने ही;
  • पाहन – पत्थर।

4) तुलसी काया खेत है, मनसा भयौ किसान।
पाप पुण्य दोउ बीज हैं, बुवै सौ लुनै निदान ॥४॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि हमारा यह शरीर एक खेत है और मन किसान है तथा पाप व पुण्य दोनों बीज हैं। इस प्रकार खेत में जिस प्रकार का बीज बो कर खेती होती है, वैसी फसल प्राप्त होती है। उसी प्रकार शरीर रूपी खेत में मन रूपी किसान पाप-पुण्य दोनों के बीज डालता है। इनमें से जो भी बीज किसान बोता है, उसी की फसल भी काटता है। अर्थात् मनुष्य का मन ही पाप व पुण्य दोनों में से किसी एक की ओर आकर्षित होता है। हम जैसा बोयेंगे, वैसा ही फल पायेंगे अर्थात् अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा मिलेगा।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 4

Tulasidasji says that our body is like a farm, whereas our mind is like a farmer and sin and virtue are like seeds. Thus, whatever type of seed is sown in the farm, the produce of the farm will be of that quality. Similarly, in our body (which is like a farm), our mind (the farmer) sows seeds of both sin and virtue. Whichever seeds the mind nourishes and nurtures will grow and yield produce. What the poet is implying is that the human mind is attracted to either sin or virtue. Whichever one our mind is attracted to, we have to reap the results of that quality. Good deeds always produce good results and bad deeds always produce bad results.

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शब्दार्थ :

  • काया – शरीर;
  • भयौ – होता है;
  • दोऊ – दोनों;
  • निदान – अंत में

5) मधुर बचन तें जात मिटै, उत्तम जन अभिमान|
तनक सीत जलसों मिटै, जैसे दूध उफान ॥५॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि मधुर वचनों से या मीठी वाणी से अच्छे लोगों का अभिमान भी मिट जाता है। जैसे कि उफनते हुए गरम दूध में थोड़ा-सा ही शीतल (ठंडा) जल डाल देंगे, तो वह शांत हो जाएगा अर्थात् उफनेगा नहीं। इस प्रकार मधुर वचन का लाभ है।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 5

Tulasidasji says that through a soulful song or a sweet voice, the pride (ego) of even good persons is easily erased. It is similar to the act of adding cool water to boiling milk. When we add cool water to boiling milk, the milk which was bubbling and frothing, suddenly becomes calm. Such is the benefit of a touching song or a sweet voice.

शब्दार्थ :

  • जात मिटै – मिट जाता है;
  • अभिमान – अहंकार, गर्व;
  • तनक – थोड़ा
  • सीत जलसो – ठंडा पानी से;
  • उफान – उबराना

6) गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।
जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान ॥६॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि मनुष्य के पास भले ही गौ रूपी धन हो, गज (हाथी) रूपी धन हो, वाजि (घोड़ा) रूपी धन हो और रत्न रूपी धन का भंडार हो, वह कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। जब उसके पास सन्तोष रूपी धन आ जाता है, तो बाकी सभी धन उसके लिए धूल या मिट्टी के बराबर है। अर्थात् सन्तोष ही सबसे बड़ी सम्पत्ति है।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 6

Tulasidasji says that even if a man has a wealth of corps, or a wealth of elephants, or a wealth of horses or even a wealth of gems and diamonds, he will never be satisfied. When a man comes to possess wealth in the form of satisfaction, then all other forms of wealth are just like dust or sand, i.e., they appear to be worthless.This means that satisfaction and happiness are the.. greatest wealth in the world.

शब्दार्थ :

  • वाजि – घोड़ा;
  • धूरि – धूल।

7) काम, क्रोध, मद, लोभकी, जौ लौं मन में खान।
तौं लौ पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान ॥७॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य के मन में काम (वासना), क्रोध, घमंड, लोभ आदि विकार उत्पन्न होते रहते हैं, तब तक वह विद्वान होते हुए भी मूर्ख के समान है। इसलिए मनुष्य को काम, क्रोध, मद तथा लोभ का शीघ्र ही त्याग कर देना चाहिए।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 7

Tulasidasji says that as long as a person’s mind is under the influence of lust (fancy), anger, arrogance, greed and other such bad qualities, till then even if he is a learned person, he is equal to a fool. Thus, the poet warns us that we must stay away from, or immediately abandon qualities like lust, anger, intoxication etc.

शब्दार्थ :

  • जौ लौं – जब तक;
  • तौं लौ – तब तक।

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8) आवत ही हर्षे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइए, कञ्चन बरसे मेह ॥८॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि किसी के घर जाने पर वह प्रसन्न नहीं होता और उसके नेत्रों में स्नेह नहीं झलकता, तो उसके घर में कभी नहीं जाना चाहिए, भले ही वहाँ सोने की वर्षा क्यों न होती हो। अर्थात् कोई व्यक्ति कितना ही बड़ा अमीर क्यों न हो, उसके घर जाने पर अतिथि सत्कार नहीं होता हो, तो वहाँ नहीं जाना चाहिए।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 8

Tulasidasji says that upon visiting someone’s house, if they are not happy to see us, or if we cannot see love reflected in their eyes, then we must never enter that house even if gold is showered in that house. This means that no matter how rich a person is, if we are not welcome in their house, or if guests are not honoured in their house, then we must never go there.

शब्दार्थ :

  • नैनन – आँखों में, नयनों में;
  • आवत ही – आते समय;
  • कञ्चन – सोना;
  • मेह – मेघ, बादल

9) तुलसी कबहुँ न त्यागिए, अपने कुल की रीति।
लायक ही सो कीजिए, ब्याह, बैर अरु प्रीति ॥९॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि अपने कुल की रीति को या परंपरा को कभी भी त्यागना नहीं चाहिए। कहा गया है कि जो योग्य हो अथवा लायक हो उसी से विवाह रचाया जाना चाहिए। बैर भी सोच-समझ कर जो उसके लायक हो उसी से करना चाहिए तथा लायक से ही प्रीति करनी चाहिए।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 9

Tulasidasji says that we must never abandon the ways or traditions of our ancestors. It has been said that one must only marry a person who deserves or is worth marrying. Even as our enemies, we must only choose those who are worthy of us. Similarly, one must also love a person who is deserving or worthy of our love.

शब्दार्थ :

  • कबहुँ – कभी;
  • लायक – उपयुक्त, ठीक

10) बिना तेज के पुरुष की, अवशि अवज्ञा होय।
आगि बुझे ज्यों राखको, आपु छुवै सब कोय ॥१०॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि तेजहीन मनुष्य का संसार में निश्चय ही अपमान होता है। अतः हर एक मनुष्य को अपना तेज, स्वाभिमान को बचाए रखना चाहिए। जिस प्रकार अग्नि के बुझ जाने पर, राख को न केवल स्पर्श करना सरल हो जाता है, अपितु उसे तो लोग रौंद भी देते हैं। वही जलती हुई आग का स्पर्श करना सहज नहीं होता है। उसी प्रकार तेजहीन मनुष्य का अपमान करना सरल है, परन्तु तेजयुक्त व्यक्ति का अपमान कोई नहीं कर सकता।

तुलसीदास के दोहे Summary in Kannada 10

Tulasidasji says that in this world it is certain that a person without knowledge and education will be insulted. It becomes quite easy to touch the ashes when the fire is extinguished. In fact, the ashes are also trampled upon by people. The same fire, before it is extinguished, is not so easy to touch. In the same manner, an uneducated person is easy to insult, but no one can insult an enlightened person.

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शब्दार्थ :

  • तेज – तेजस्, स्वाभिमान, कीर्ति;
  • अवशि – अवश्य;
  • अवज्ञा – अनादर, अपमान।